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ज़बूर 75

किताबे-मुक़द्दस · urdu

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1आसफ़ का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। तर्ज़ : तबाह न कर।

2अल्लाह फ़रमाता है, “जब मेरा वक़्त आएगा तो मैं इनसाफ़ से अदालत करूँगा।

3गो ज़मीन अपने बाशिंदों समेत डगमगाने लगे, लेकिन मैं ही ने उसके सतूनों को मज़बूत कर दिया है। (सिलाह)

4शेख़ीबाज़ों से मैंने कहा, ‘डींगें मत मारो,’ और बेदीनों से, ‘अपने आप पर फ़ख़र मत करो। लफ़्ज़ी तरजुमा : सींग मत उठाओ।

5न अपनी ताक़त पर शेख़ी मारो, लफ़्ज़ी मतलब : न अपना सींग उठाओ। न अकड़कर कुफ़र बको’।”

6क्योंकि सरफ़राज़ी न मशरिक़ से, न मग़रिब से और न बयाबान से आती है

7बल्कि अल्लाह से जो मुंसिफ़ है। वही एक को पस्त कर देता है और दूसरे को सरफ़राज़।

8क्योंकि रब के हाथ में झागदार और मसालेदार मै का प्याला है जिसे वह लोगों को पिला देता है। यक़ीनन दुनिया के तमाम बेदीनों को इसे आख़िरी क़तरे तक पीना है।

9लेकिन मैं हमेशा अल्लाह के अज़ीम काम सुनाऊँगा, हमेशा याक़ूब के ख़ुदा की मद्हसराई करूँगा।

10अल्लाह फ़रमाता है, “मैं तमाम बेदीनों की कमर तोड़ दूँगा जबकि रास्तबाज़ सरफ़राज़ होगा।” लफ़्ज़ी तरजुमा : बेदीनों के तमाम सींगों को काट डालूँगा जबकि रास्तबाज़ों का सींग सरफ़राज़ हो जाएगा।

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ज़बूर 75 — urdu:

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