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ज़बूर 129

किताबे-मुक़द्दस · urdu

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1ज़ियारत का गीत।

2मेरी जवानी से ही वह बार बार मुझ पर हमलाआवर हुए हैं। तो भी वह मुझ पर ग़ालिब न आए।”

3हल चलानेवालों ने मेरी पीठ पर हल चलाकर उस पर अपनी लंबी लंबी रेघारयाँ बनाई हैं।

4रब रास्त है। उसने बेदीनों के रस्से काटकर मुझे आज़ाद कर दिया है।

5अल्लाह करे कि जितने भी सिय्यून से नफ़रत रखें वह शरमिंदा होकर पीछे हट जाएँ।

6वह छतों पर की घास की मानिंद हों जो सहीह तौर पर बढ़ने से पहले ही मुरझा जाती है

7और जिससे न फ़सल काटनेवाला अपना हाथ, न पूले बाँधनेवाला अपना बाज़ू भर सके।

8जो भी उनसे गुज़रे वह न कहे, “रब तुम्हें बरकत दे।”

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ज़बूर 129 — urdu:

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