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ज़बूर 119

इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) उर्दू - 2019 · urdu

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1मुबारक हैं वह जो कामिल रफ़्तार है,

2मुबारक हैं वह जो उसकी शहादतों को मानते हैं,

3उन से नारास्ती नहीं होती,

4तूने अपने क़वानीन दिए हैं,

5काश कि तेरे क़ानून मानने के लिए,

6जब मैं तेरे सब अहकाम का लिहाज़ रख्खूँगा,

7जब मैं तेरी सदाक़त के अहकाम सीख लूँगा,

8मैं तेरे क़ानून मानूँगा;

9जवान अपने चाल चलन किस तरह पाक रख्खे?

10मैं पूरे दिल से तेरा तालिब हुआ हूँ:

11मैंने तेरे कलाम को अपने दिल में रख लिया है

12ऐ ख़ुदावन्द! तू मुबारक है;

13मैंने अपने लबों से,

14मुझे तेरी शहादतों की राह से ऐसी ख़ुशी हुई,

15मैं तेरे क़वानीन पर ग़ौर करूँगा,

16मैं तेरे क़ानून में मसरूर रहूँगा;

17अपने बन्दे पर एहसान कर ताकि मैं जिन्दा रहूँ

18मेरी आँखे खोल दे,

19मैं ज़मीन पर मुसाफ़िर हूँ,

20मेरा दिल तेरे अहकाम के इश्तियाक में,

21तूने उन मला'ऊन मग़रूरों को झिड़क दिया,

22मलामत और हिक़ारत को मुझ से दूर कर दे,

23उमरा भी बैठकर मेरे ख़िलाफ़ बातें करते रहे,

24तेरी शहादतें मुझे पसन्द, और मेरी मुशीर हैं।

25मेरी जान ख़ाक में मिल गई:

26मैंने अपने चाल चलन का इज़हार किया और तूने मुझे जवाब दिया;

27अपने क़वानीन की राह मुझे समझा दे,

28ग़म के मारे मेरी जान घुली जाती है;

29झूट की राह से मुझे दूर रख,

30मैंने वफ़ादारी की राह इख़्तियार की है,

31मैं तेरी शहादतों से लिपटा हुआ हूँ,

32जब तू मेरा हौसला बढ़ाएगा,

33ऐ ख़ुदावन्द, मुझे अपने क़ानून की राह बता,

34मुझे समझ 'अता कर और मैं तेरी शरी'अत पर चलूँगा,

35मुझे अपने फ़रमान की राह पर चला,

36मेरे दिल की अपनी शहादतों की तरफ़ रुजू' दिला;

37मेरी आँखों को बेकारी पर नज़र करने से बाज़ रख,

38अपने बन्दे के लिए अपना वह क़ौल पूरा कर,

39मेरी मलामत को जिस से मैं डरता हूँ दूर कर दे;

40देख, मैं तेरे क़वानीन का मुश्ताक़ रहा हूँ;

41ऐ ख़ुदावन्द, तेरे क़ौल के मुताबिक़,

42तब मैं अपने मलामत करने वाले को जवाब दे सकूँगा,

43और हक़ बात को मेरे मुँह से हरगिज़ जुदा न होने दे,

44फिर मैं हमेशा से हमेशा तक,

45और मैं आज़ादी से चलूँगा,

46मैं बादशाहों के सामने तेरी शहादतों का बयान करूँगा,

47तेरे फ़रमान मुझे अज़ीज़ हैं,

48मैं अपने हाथ तेरे फ़रमान की तरफ़ जो मुझे 'अज़ीज़ है उठाऊँगा,

49जो कलाम तूने अपने बन्दे से किया उसे याद कर,

50मेरी मुसीबत में यही मेरी तसल्ली है,

51मग़रूरों ने मुझे बहुत ठठ्ठों में उड़ाया,

52ऐ ख़ुदावन्द! मैं तेरे क़दीम अहकाम को याद करता,

53उन शरीरों की वजह से जो तेरी शरी'अत को छोड़ देते हैं,

54मेरे मुसाफ़िर ख़ाने में,

55ऐ ख़ुदावन्द, रात को मैंने तेरा नाम याद किया है,

56यह मेरे लिए इसलिए हुआ,

57ख़ुदावन्द मेरा बख़रा है;

58मैं पूरे दिल से तेरे करम का तलब गार हुआ;

59मैंने अपनी राहों पर ग़ौर किया,

60मैंने तेरे फ़रमान मानने में,

61शरीरों की रस्सियों ने मुझे जकड़ लिया,

62तेरी सदाकत के अहकाम के लिए,

63मैं उन सबका साथी हूँ जो तुझ से डरते हैं,

64ऐ ख़ुदावन्द, ज़मीन तेरी शफ़क़त से मा'मूर है;

65ऐ ख़ुदावन्द! तूने अपने कलाम के मुताबिक़,

66मुझे सही फ़र्क़ और 'अक़्ल सिखा,

67मैं मुसीबत उठाने से पहले गुमराह था;

68तू भला है और भलाई करता है;

69मग़रूरों ने मुझ पर बहुतान बाँधा है;

70उनके दिल चिकनाई से फ़र्बा हो गए,

71अच्छा हुआ कि मैंने मुसीबत उठाई,

72तेरे मुँह की शरी'अत मेरे लिए,

73तेरे हाथों ने मुझे बनाया और तरतीब दी;

74तुझ से डरने वाले मुझे देख कर

75ऐ ख़ुदावन्द, मैं तेरे अहकाम की सदाक़त को जानता हूँ,

76उस कलाम के मुताबिक़ जो तूनेअपने बन्दे से किया,

77तेरी रहमत मुझे नसीब हो ताकि मैं ज़िन्दा रहूँ।

78मग़रूर शर्मिन्दा हों, क्यूँकि उन्होंने नाहक़ मुझे गिराया,

79तुझ से डरने वाले मेरी तरफ़ रुजू हों,

80मेरा दिल तेरे क़ानून मानने में कामिल रहे,

81मेरी जान तेरी नजात के लिए बेताब है,

82तेरे कलाम के इन्तिज़ार में मेरी आँखें रह गई,

83मैं उस मश्कीज़े की तरह हो गया जो धुएँ में हो,

84तेरे बन्दे के दिन ही कितने हैं?

85मग़रूरों ने जो तेरी शरी'अत के पैरौ नहीं,

86तेरे सब फ़रमान बरहक़ हैं: वह नाहक़ मुझे सताते हैं;

87उन्होंने मुझे ज़मीन पर से फ़नाकर ही डाला था,

88तू मुझे अपनी शफ़क़त के मुताबिक़ ज़िन्दा कर,

89ऐ ख़ुदावन्द! तेरा कलाम,

90तेरी वफ़ादारी नसल दर नसल है;

91वह आज तेरे अहकाम के मुताबिक़ क़ाईम हैं

92अगर तेरी शरी'अत मेरी ख़ुशनूदी न होती,

93मैं तेरे क़वानीन को कभी न भूलूँगा,

94मैं तेरा ही हूँ मुझे बचा ले,

95शरीर मुझे हलाक करने को घात में लगे रहे,

96मैंने देखा कि हर कमाल की इन्तिहा है,

97आह! मैं तेरी शरी'अत से कैसी मुहब्बत रखता हूँ,

98तेरे फ़रमान मुझे मेरे दुश्मनों से ज़्यादा 'अक़्लमंद बनाते हैं,

99मैं अपने सब उस्तादों से 'अक़्लमंद हैं,

100मैं उम्र रसीदा लोगों से ज़्यादा समझ रखता हूँ

101मैंने हर बुरी राह से अपने क़दम रोक रख्खें हैं,

102मैंने तेरे अहकाम से किनारा नहीं किया,

103तेरी बातें मेरे लिए कैसी शीरीन हैं,

104तेरे क़वानीन से मुझे समझ हासिल होता है,

105तेरा कलाम मेरे क़दमों के लिए चराग़,

106मैंने क़सम खाई है और उस पर क़ाईम हूँ,

107मैं बड़ी मुसीबत में हूँ। ऐ ख़ुदावन्द!

108ऐ ख़ुदावन्द, मेरे मुँह से रज़ा की क़ुर्बानियाँ क़ुबूल फ़रमा

109मेरी जान हमेशा हथेली पर है,

110शरीरों ने मेरे लिए फंदा लगाया है,

111मैंने तेरी शहादतों को अपनी हमेशा की मीरास बनाया है,

112मैंने हमेशा के लिए आख़िर तक,

113मुझे दो दिलों से नफ़रत है,

114तू मेरे छिपने की जगह और मेरी ढाल है;

115ऐ बदकिरदारो! मुझ से दूर हो जाओ,

116तू अपने कलाम के मुताबिक़ मुझे संभाल ताकि ज़िन्दा रहूँ,

117मुझे संभाल और मैं सलामत रहूँगा,

118तूने उन सबको हक़ीर जाना है,

119तू ज़मीन के सब शरीरों को मैल की तरह छाँट देता है;

120मेरा जिस्म तेरे ख़ौफ़ से काँपता है,

121मैंने 'अद्ल और इन्साफ़ किया है;

122भलाई के लिए अपने बन्दे का ज़ामिन हो,

123तेरी नजात और तेरी सदाक़त के कलाम के इन्तिज़ार में मेरी आँखें रह गई।

124अपने बन्दे से अपनी शफ़क़त के मुताबिक़ सुलूक कर,

125मैं तेरा बन्दा हूँ! मुझ को समझ 'अता कर,

126अब वक़्त आ गया, कि ख़ुदावन्द काम करे,

127इसलिए मैं तेरे फ़रमान को सोने से बल्कि कुन्दन से भी ज़्यादा अज़ीज़ रखता हूँ।

128इसलिए मैं तेरे सब कवानीन को बरहक़ जानता हूँ,

129तेरी शहादतें 'अजीब हैं,

130तेरी बातों की तशरीह नूर बख़्शती है,

131मैं खू़ब मुँह खोलकर हाँपता रहा,

132मेरी तरफ़ तवज्जुह कर और मुझ पर रहम फ़रमा,

133अपने कलाम में मेरी रहनुमाई कर,

134इंसान के ज़ुल्म से मुझे छुड़ा ले,

135अपना चेहरा अपने बन्दे पर जलवागर फ़रमा,

136मेरी आँखों से पानी के चश्मे जारी हैं,

137ऐ ख़ुदावन्द तू सादिक़ है,

138तूने सदाक़त और कमाल वफ़ादारी से,

139मेरी गै़रत मुझे खा गई,

140तेरा कलाम बिल्कुल ख़ालिस है,

141मैं अदना और हक़ीर हूँ,

142तेरी सदाक़त हमेशा की सदाक़त है,

143मैं तकलीफ़ और ऐज़ाब में मुब्तिला,

144तेरी शहादतें हमेशा रास्त हैं;

145मैं पूरे दिल से दुआ करता हूँ,

146मैंने तुझ से दुआ की है, मुझे बचा ले,

147मैंने पौ फटने से पहले फ़रियाद की;

148मेरी आँखें रात के हर पहर से पहले खुल गई,

149अपनी शफ़क़त के मुताबिक़ मेरी फ़रियाद सुन:

150जो शरारत के दर पै रहते हैं, वह नज़दीक आ गए;

151ऐ ख़ुदावन्द, तू नज़दीक है,

152तेरी शहादतों से मुझे क़दीम से मा'लूम हुआ,

153मेरी मुसीबत का ख़याल करऔर मुझे छुड़ा,

154मेरी वकालत कर और मेरा फ़िदिया दे:

155नजात शरीरों से दूर है,

156ऐ ख़ुदावन्द! तेरी रहमत बड़ी है;

157मेरे सताने वाले और मुखालिफ़ बहुत हैं,

158मैं दग़ाबाज़ों को देख कर मलूल हुआ,

159ख़याल फ़रमा कि मुझे तेरे क़वानीन से कैसी मुहब्बत है!

160तेरे कलाम का ख़ुलासा सच्चाई है,

161उमरा ने मुझे बे वजह सताया है,

162मैं बड़ी लूट पाने वाले की तरह,

163मुझे झूट से नफ़रत और कराहियत है,

164मैं तेरी सदाक़त के अहकाम की वजह से,

165तेरी शरी'अत से मुहब्बत रखने वाले मुत्मइन हैं;

166ऐ ख़ुदावन्द! मैं तेरी नजात का उम्मीदवार रहा हूँ

167मेरी जान ने तेरी शहादतें मानी हैं,

168मैंने तेरे क़वानीन और शहादतों को माना है,

169ऐ ख़ुदावन्द! मेरी फ़रियाद तेरे सामने पहुँचे;

170मेरी इल्तिजा तेरे सामने पहुँचे,

171मेरे लबों से तेरी सिताइश हो।

172मेरी ज़बान तेरे कलाम का हम्द गाए,

173तेरा हाथ मेरी मदद को तैयार है

174ऐ ख़ुदावन्द! मैं तेरी नजात का मुश्ताक़ रहा हूँ,

175मेरी जान ज़िन्दा रहे तो वह तेरी सिताइश करेगी,

176मैं खोई हुई भेड़ की तरह भटक गया हूँ

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