1इस्राएल अब यह कहे,
2मेरे बचपन से वे मुझ को बार बार क्लेश देते तो आए हैं,
3हलवाहों ने मेरी पीठ के ऊपर हल चलाया129:3 हलवाहों ने मेरी पीठ के ऊपर हल चलाया: यह रूपक ही भूमि जोतने का है उसमें निहित विचार यह है कि कष्ट ऐसे हैं जैसे हल धरती का सीना चीरता है। ,
4यहोवा धर्मी है;
5जितने सिय्योन से बैर रखते हैं,
6वे छत पर की घास के समान हों,
7जिससे कोई लवनेवाला अपनी मुट्ठी नहीं भरता129:7 जिससे कोई लवनेवाला अपनी मुट्ठी नहीं भरता: वह एकत्र करके मवेशियों के लिए नहीं रखी जाती जैसे मैदान की घास। ऐसे किसी काम के लिए वह व्यर्थ है या वह पूर्णतः निकम्मी है। ,
8और न आने-जानेवाले यह कहते हैं,