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ज़बूर 82

किताबे-मुक़द्दस · urdu

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1आसफ़ का ज़बूर।

2“तुम कब तक अदालत में ग़लत फ़ैसले करके बेदीनों की जानिबदारी करोगे? (सिलाह)

3पस्तहालों और यतीमों का इनसाफ़ करो, मुसीबतज़दों और ज़रूरतमंदों के हुक़ूक़ क़ायम रखो।

4पस्तहालों और ग़रीबों को बचाकर बेदीनों के हाथ से छुड़ाओ।”

5लेकिन वह कुछ नहीं जानते, उन्हें समझ ही नहीं आती। वह तारीकी में टटोल टटोलकर घुमते-फिरते हैं जबकि ज़मीन की तमाम बुनियादें झूमने लगी हैं।

6बेशक मैंने कहा, “तुम ख़ुदा हो, सब अल्लाह तआला के फ़रज़ंद हो।

7लेकिन तुम फ़ानी इनसान की तरह मर जाओगे, तुम दीगर हुक्मरानों की तरह गिर जाओगे।”

8ऐ अल्लाह, उठकर ज़मीन की अदालत कर! क्योंकि तमाम अक़वाम तेरी ही मौरूसी मिलकियत हैं।

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ज़बूर 82 — urdu:

इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) उर्दू - 2019Kitab-i Muqaddasکتابِ مقدّس