1क़ोरह की औलाद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। गीत का तर्ज़ : कुँवारियाँ।
2इसलिए हम ख़ौफ़ नहीं खाएँगे, गो ज़मीन लरज़ उठे और पहाड़ झूमकर समुंदर की गहराइयों में गिर जाएँ,
3गो समुंदर शोर मचाकर ठाठें मारे और पहाड़ उस की दहाड़ों से काँप उठें। (सिलाह)
4दरिया की शाख़ें अल्लाह के शहर को ख़ुश करती हैं, उस शहर को जो अल्लाह तआला की मुक़द्दस सुकूनतगाह है।
5अल्लाह उसके बीच में है, इसलिए शहर नहीं डगमगाएगा। सुबह-सवेरे ही अल्लाह उस की मदद करेगा।
6क़ौमें शोर मचाने, सलतनतें लड़खड़ाने लगीं। अल्लाह ने आवाज़ दी तो ज़मीन लरज़ उठी।
7रब्बुल-अफ़वाज हमारे साथ है, याक़ूब का ख़ुदा हमारा क़िला है। (सिलाह)
8आओ, रब के अज़ीम कामों पर नज़र डालो! उसी ने ज़मीन पर हौलनाक तबाही नाज़िल की है।
9वही दुनिया की इंतहा तक जंगें रोक देता, वही कमान को तोड़ देता, नेज़े को टुकड़े टुकड़े करता और ढाल को जला देता है।
10वह फ़रमाता है, “अपनी हरकतों से बाज़ आओ! जान लो कि मैं ख़ुदा हूँ। मैं अक़वाम में सरबुलंद और दुनिया में सरफ़राज़ हूँगा।”
11रब्बुल-अफ़वाज हमारे साथ है। याक़ूब का ख़ुदा हमारा क़िला है। (सिलाह)