1जब अहूद फ़ौत हुआ तो इसराईली दुबारा ऐसी हरकतें करने लगे जो रब के नज़दीक बुरी थीं।
2उन दिनों में दबोरा नबिया इसराईल की क़ाज़ी थी। उसका शौहर लफ़ीदोत था,
3और वह ‘दबोरा के खजूर’ के पास रहती थी जो इफ़राईम के पहाड़ी इलाक़े में रामा और बैतेल के दरमियान था। इस दरख़्त के साय में वह इसराईलियों के मामलात के फ़ैसले किया करती थी।
4एक दिन दबोरा ने बरक़ बिन अबीनुअम को बुलाया। बरक़ नफ़ताली के क़बायली इलाक़े के शहर क़ादिस में रहता था। दबोरा ने बरक़ से कहा, “रब इसराईल का ख़ुदा आपको हुक्म देता है, ‘नफ़ताली और ज़बूलून के क़बीलों में से 10,000 मर्दों को जमा करके उनके साथ तबूर पहाड़ पर चढ़ जा!
5मैं याबीन के लशकर के सरदार सीसरा को उसके रथों और फ़ौज समेत तेरे क़रीब की क़ैसोन नदी के पास खींच लाऊँगा। वहाँ मैं उसे तेरे हाथ में कर दूँगा’।”
6बरक़ ने जवाब दिया, “मैं सिर्फ़ इस सूरत में जाऊँगा कि आप भी साथ जाएँ। आपके बग़ैर मैं नहीं जाऊँगा।”
7दबोरा ने कहा, “ठीक है, मैं ज़रूर आपके साथ जाऊँगी। लेकिन इस सूरत में आपको सीसरा पर ग़ालिब आने की इज़्ज़त हासिल नहीं होगी बल्कि एक औरत को। क्योंकि रब सीसरा को एक औरत के हवाले कर देगा।”
8वहाँ बरक़ ने ज़बूलून और नफ़ताली के क़बीलों को अपने पास बुला लिया। 10,000 आदमी उस की राहनुमाई में तबूर पहाड़ पर चले गए। दबोरा भी साथ गई।
9उन दिनों में एक क़ीनी बनाम हिबर ने अपना ख़ैमा क़ादिस के क़रीब ऐलोन-ज़ाननीम में लगाया हुआ था। क़ीनी मूसा के साले होबाब की औलाद में से था। लेकिन हिबर दूसरे क़ीनियों से अलग रहता था।
10अब सीसरा को इत्तला दी गई कि बरक़ बिन अबीनुअम फ़ौज लेकर पहाड़ तबूर पर चढ़ गया है।
11यह सुनकर वह हरूसत-हगोयम से रवाना होकर अपने 900 रथों और बाक़ी लशकर के साथ क़ैसोन नदी पर पहुँच गया।
12तब दबोरा ने बरक़ से बात की, “हमला के लिए तैयार हो जाएँ, क्योंकि रब ने आज ही सीसरा को आपके क़ाबू में कर दिया है। रब आपके आगे आगे चल रहा है।” चुनाँचे बरक़ अपने 10,000 आदमियों के साथ तबूर पहाड़ से उतर आया।
13जब उन्होंने दुश्मन पर हमला किया तो रब ने कनानियों के पूरे लशकर में रथों समेत अफ़रा-तफ़री पैदा कर दी। सीसरा अपने रथ से उतरकर पैदल ही फ़रार हो गया।
14बरक़ के आदमियों ने भागनेवाले फ़ौजियों और उनके रथों का ताक़्क़ुब करके उनको हरूसत-हगोयम तक मारते गए। एक भी न बचा।
15इतने में सीसरा पैदल चलकर क़ीनी आदमी हिबर की बीवी याएल के ख़ैमे के पास भाग आया था। वजह यह थी कि हसूर के बादशाह याबीन के हिबर के घराने के साथ अच्छे ताल्लुक़ात थे।
16याएल ख़ैमे से निकलकर सीसरा से मिलने गई। उसने कहा, “आएँ मेरे आक़ा, अंदर आएँ और न डरें।” चुनाँचे वह अंदर आकर लेट गया, और याएल ने उस पर कम्बल डाल दिया।
17सीसरा ने कहा, “मुझे प्यास लगी है, कुछ पानी पिला दो।” याएल ने दूध का मशकीज़ा खोलकर उसे पिला दिया और उसे दुबारा छुपा दिया।
18सीसरा ने दरख़ास्त की, “दरवाज़े में खड़ी हो जाओ! अगर कोई आए और पूछे कि क्या ख़ैमे में कोई है तो बोलो कि नहीं, कोई नहीं है।”
19यह कहकर सीसरा गहरी नींद सो गया, क्योंकि वह निहायत थका हुआ था। तब याएल ने मेख़ और हथोड़ा पकड़ लिया और दबे पाँव सीसरा के पास जाकर मेख़ को इतने ज़ोर से उस की कनपटी में ठोंक दिया कि मेख़ ज़मीन में धँस गई और वह मर गया।
20कुछ देर के बाद बरक़ सीसरा के ताक़्क़ुब में वहाँ से गुज़रा। याएल ख़ैमे से निकलकर उससे मिलने आई और बोली, “आएँ, मैं आपको वह आदमी दिखाती हूँ जिसे आप ढूँड रहे हैं।” बरक़ उसके साथ ख़ैमे में दाख़िल हुआ तो क्या देखा कि सीसरा की लाश ज़मीन पर पड़ी है और मेख़ उस की कनपटी में से गुज़रकर ज़मीन में गड़ गई है।
21उस दिन अल्लाह ने कनानी बादशाह याबीन को इसराईलियों के सामने ज़ेर कर दिया।
22इसके बाद उनकी ताक़त बढ़ती गई जबकि याबीन कमज़ोर होता गया और आख़िरकार इसराईलियों के हाथों तबाह हो गया।