1ऐ ख़ुदावन्द! दाऊद कि ख़ातिर उसकी सब मुसीबतों को याद कर;
2कि उसने किस तरह ख़ुदावन्द से क़सम खाई,
3“यक़ीनन मैं न अपने घर में दाख़िल हूँगा,
4और न अपनी आँखों में नींद,
5जब तक ख़ुदावन्द के लिए कोई जगह,
6देखो, हम ने उसकी ख़बर इफ़्राता में सुनी;
7हम उसके घरों में दाखि़ल होंगे,
8उठ, ऐ ख़ुदावन्द! अपनी आरामगाह में दाखि़ल हो!
9तेरे काहिन सदाक़त से मुलब्बस हों,
10अपने बन्दे दाऊद की ख़ातिर,
11ख़ुदावन्द ने सच्चाई के साथ दाऊद से क़सम खाई है;
12अगर तेरे फ़र्ज़न्द मेरे 'अहद और मेरी शहादत पर,
13क्यूँकि ख़ुदावन्द ने सिय्यून को चुना है,
14“यह हमेशा के लिए मेरी आरामगाह है;
15मैं इसके रिज़क़ में ख़ूब बरकत दूँगा;
16इसके काहिनों को भी मैं नजात से मुलव्वस करूँगा
17वहीं मैं दाऊद के लिए एक सींग निकालूँगा मैंने
18मैं उसके दुश्मनों को शर्मिन्दगी का लिबास पहनाऊँगा,