1न्यायाधीशो, क्या वास्तव में तुम्हारा निर्णय न्याय संगत होता है?
2नहीं, मन ही मन तुम अन्यायपूर्ण युक्ति करते रहते हो,
3दुष्ट लोग जन्म से ही फिसलते हैं, गर्भ से ही;
4उनका विष विषैले सर्प का विष है,
5कि अब उसे संपेरे की धुन सुनाई न दे,
6परमेश्वर, उनके मुख के भीतर ही उनके दांत तोड़ दीजिए;
7वे जल के जैसे बहकर विलीन हो जाएं;
8वे उस घोंघे के समान हो जाएं, जो सरकते-सरकते ही गल जाता है,
9इसके पूर्व कि कंटीली झाड़ियों में लगाई अग्नि का ताप पकाने के पात्र तक पहुंचे,
10धर्मी के लिए ऐसा पलटा आनन्द-दायक होगा,
11तब मनुष्य यह कह उठेंगे,