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भजन संहिता 58

इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) हिंदी - 2019 · hindi

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1हे मनुष्यों, क्या तुम सचमुच धार्मिकता की बात बोलते हो?

2नहीं, तुम मन ही मन में कुटिल काम करते हो;

3दुष्ट लोग जन्मते ही पराए हो जाते हैं,

4उनमें सर्प का सा विष है;

5और सपेरा कितनी ही निपुणता से क्यों न मंत्र पढ़े,

6हे परमेश्वर, उनके मुँह में से दाँतों को तोड़ दे;

7वे घुलकर बहते हुए पानी के समान हो जाएँ;

8वे घोंघे के समान हो जाएँ जो घुलकर नाश हो जाता है,

9इससे पहले कि तुम्हारी हाँड़ियों में काँटों की आँच लगे,

10परमेश्वर का ऐसा पलटा देखकर आनन्दित होगा;

11तब मनुष्य कहने लगेंगे, निश्चय धर्मी के लिये फल है;

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भजन संहिता 58 — hindi:

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