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स्तोत्र 38

Biblica® हिंदी समकालीन संस्करण-स्वतंत्र उपलब्धि · hindi

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1याहवेह, अपने क्रोध में मुझे न डांटिए

2क्योंकि आपके बाण मुझे लग चुके हैं,

3आपके प्रकोप ने मेरी देह को स्वस्थ नहीं छोड़ा;

4मैं अपने अपराधों में डूब चुका हूं;

5मेरे घाव सड़ चुके हैं, वे अत्यंत घृणास्पद हैं

6मैं झुक गया हूं, दुर्बलता के शोकभाव से अत्यंत नीचा हो गया हूं;

7मेरी कमर में जलती-चुभती-सी पीड़ा हो रही है;

8मैं दुर्बल हूं और टूट चुका हूं;

9प्रभु, आपको यह ज्ञात है कि मेरी आकांक्षा क्या है;

10मेरे हृदय की धड़कने तीव्र हो गई हैं, मुझमें बल शेष न रहा;

11मेरे मित्र तथा मेरे साथी मेरे घावों के कारण मेरे निकट नहीं आना चाहते;

12मेरे प्राणों के प्यासे लोगों ने मेरे लिए जाल बिछाया है,

13मैं बधिर मनुष्य जैसा हो चुका हूं, जिसे कुछ सुनाई नहीं देता,

14हां, मैं उस पुरुष-सा हो चुका हूं, जिसकी सुनने की शक्ति जाती रही,

15याहवेह, मैंने आप पर ही भरोसा किया है;

16मैंने आपसे अनुरोध किया था, “यदि मेरे पैर फिसलें,

17अब मुझे मेरा अंत निकट आता दिख रहा है,

18मैं अपना अपराध स्वीकार कर रहा हूं;

19मेरे शत्रु प्रबल, सशक्त तथा अनेक हैं;

20वे मेरे उपकारों का प्रतिफल अपकार में देते हैं;

21याहवेह, मेरा परित्याग न कीजिए;

22तुरंत मेरी सहायता कीजिए,

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स्तोत्र 38 — hindi:

इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) हिंदी - 2019