1हे सेनाओं के यहोवा, तेरे निवास क्या ही प्रिय हैं!
2मेरा प्राण यहोवा के आँगनों की अभिलाषा करते-करते मूर्छित हो चला;
3हे सेनाओं के यहोवा, हे मेरे राजा, और मेरे परमेश्वर, तेरी वेदियों में गौरैया ने अपना बसेरा
4क्या ही धन्य हैं वे, जो तेरे भवन में रहते हैं;
5क्या ही धन्य है वह मनुष्य, जो तुझ से शक्ति पाता है,
6वे रोने की तराई84:6 रोने की तराई बाका में जाते हुए उसको सोतों का स्थान बनाते हैं;
7वे बल पर बल पाते जाते हैं84:7 वे बल पर बल पाते जाते हैं: वे एक के बाद एक विजय प्राप्त करते हैं कि मनुष्य देखे कि सिय्योन में एक धर्मनिष्ठ परमेश्वर है।;
8हे सेनाओं के परमेश्वर यहोवा, मेरी प्रार्थना सुन,
9हे परमेश्वर, हे हमारी ढाल, दृष्टि कर;
10क्योंकि तेरे आँगनों में एक दिन और कहीं के हजार दिन से उत्तम है।
11क्योंकि यहोवा परमेश्वर सूर्य और ढाल है;
12हे सेनाओं के यहोवा,