1“मेरा प्राण जीवित रहने से उकताता है;
2मैं परमेश्वर से कहूँगा, मुझे दोषी न ठहरा10:2 मैं परमेश्वर से कहूँगा, मुझे दोषी न ठहरा: अय्यूब की शिकायत का आधार यही था कि परमेश्वर अपनी प्रभुता और सामर्थ्य में उसे एक दुष्ट जन मानता है और वह कारण नहीं जान पा रहा है कि उसे ऐसा क्यों समझा जा रहा है और उसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है।;
3क्या तुझे अंधेर करना,
4क्या तेरी देहधारियों की सी आँखें हैं?
5क्या तेरे दिन मनुष्य के दिन के समान हैं,
6कि तू मेरा अधर्म ढूँढ़ता,
7तुझे तो मालूम ही है, कि मैं दुष्ट नहीं हूँ10:7 तुझे तो मालूम ही है, कि मैं दुष्ट नहीं हूँ: कि मैं पाखण्डी नहीं था एक पश्चात्ताप रहित पापी नहीं हूँ। अय्यूब सिद्ध होने का दावा नहीं करता है। (अय्यूब 9:20 पर टिप्पणी देखें) परन्तु अपने सम्पूर्ण विवाद में वह यही कहता है कि वह दुष्ट मनुष्य नहीं है। ,
8तूने अपने हाथों से मुझे ठीक रचा है और जोड़कर बनाया है;
9स्मरण कर, कि तूने मुझ को गुँधी हुई मिट्टी के समान बनाया,
10क्या तूने मुझे दूध के समान उण्डेलकर, और
11फिर तूने मुझ पर चमड़ा और माँस चढ़ाया
12तूने मुझे जीवन दिया, और मुझ पर करुणा की है;
13तो भी तूने ऐसी बातों को अपने मन में छिपा रखा;
14कि यदि मैं पाप करूँ, तो तू उसका लेखा लेगा;
15यदि मैं दुष्टता करूँ तो मुझ पर हाय!
16और चाहे सिर उठाऊँ तो भी तू सिंह के समान मेरा अहेर करता है10:16 तू सिंह के समान मेरा अहेर करता है: यहाँ कहने का अभिप्राय है कि परमेश्वर उसके पीछे ऐसे लगा हुआ है जैसे एक हिंसक शेर अपने शिकार के पीछे लगा रहता है। ,
17तू मेरे सामने अपने नये-नये साक्षी ले आता है,
18“तूने मुझे गर्भ से क्यों निकाला? नहीं तो मैं वहीं प्राण छोड़ता,
19मेरा होना न होने के समान होता,
20क्या मेरे दिन थोड़े नहीं? मुझे छोड़ दे,
21इससे पहले कि मैं वहाँ जाऊँ, जहाँ से फिर न लौटूँगा,
22और मृत्यु के अंधकार का देश