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ज़बूर 85

किताबे-मुक़द्दस · urdu

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1क़ोरह की औलाद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए।

2पहले तूने अपनी क़ौम का क़ुसूर मुआफ़ किया, उसका तमाम गुनाह ढाँप दिया। (सिलाह)

3जो ग़ज़ब हम पर नाज़िल हो रहा था उसका सिलसिला तूने रोक दिया, जो क़हर हमारे ख़िलाफ़ भड़क रहा था उसे छोड़ दिया।

4ऐ हमारी नजात के ख़ुदा, हमें दुबारा बहाल कर। हमसे नाराज़ होने से बाज़ आ।

5क्या तू हमेशा तक हमसे ग़ुस्से रहेगा? क्या तू अपना क़हर पुश्त-दर-पुश्त क़ायम रखेगा?

6क्या तू दुबारा हमारी जान को ताज़ादम नहीं करेगा ताकि तेरी क़ौम तुझसे ख़ुश हो जाए?

7ऐ रब, अपनी शफ़क़त हम पर ज़ाहिर कर, अपनी नजात हमें अता फ़रमा।

8मैं वह कुछ सुनूँगा जो ख़ुदा रब फ़रमाएगा। क्योंकि वह अपनी क़ौम और अपने ईमानदारों से सलामती का वादा करेगा, अलबत्ता लाज़िम है कि वह दुबारा हमाक़त में उलझ न जाएँ।

9यक़ीनन उस की नजात उनके क़रीब है जो उसका ख़ौफ़ मानते हैं ताकि जलाल हमारे मुल्क में सुकूनत करे।

10शफ़क़त और वफ़ादारी एक दूसरे के गले लग गए हैं, रास्ती और सलामती ने एक दूसरे को बोसा दिया है।

11सच्चाई ज़मीन से फूट निकलेगी और रास्ती आसमान से ज़मीन पर नज़र डालेगी।

12अल्लाह ज़रूर वह कुछ देगा जो अच्छा है, हमारी ज़मीन ज़रूर अपनी फ़सलें पैदा करेगी।

13रास्ती उसके आगे आगे चलकर उसके क़दमों के लिए रास्ता तैयार करेगी।

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ज़बूर 85 — urdu:

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