1यह सुनकर मैंने रंजीदा होकर अपने कपड़ों को फाड़ लिया और सर और दाढ़ी के बाल नोच नोचकर नंगे फ़र्श पर बैठ गया।
2वहाँ मैं शाम की क़ुरबानी तक बेहिसो-हरकत बैठा रहा। इतने में बहुत-से लोग मेरे इर्दगिर्द जमा हो गए। वह जिलावतनी से वापस आए हुए लोगों की बेवफ़ाई के बाइस थरथरा रहे थे, क्योंकि वह इसराईल के ख़ुदा के जवाब से निहायत ख़ौफ़ज़दा थे।
3शाम की क़ुरबानी के वक़्त मैं वहाँ से उठ खड़ा हुआ जहाँ मैं तौबा की हालत में बैठा हुआ था। वही फटे हुए कपड़े पहने हुए मैं घुटने टेककर झुक गया और अपने हाथों को आसमान की तरफ़ उठाए हुए रब अपने ख़ुदा से दुआ करने लगा,
4“ऐ मेरे ख़ुदा, मैं निहायत शरमिंदा हूँ। अपना मुँह तेरी तरफ़ उठाने की मुझमें जुर्रत नहीं रही। क्योंकि हमारे गुनाहों का इतना बड़ा ढेर लग गया है कि वह हमसे ऊँचा है, बल्कि हमारा क़ुसूर आसमान तक पहुँच गया है।
5हमारे बापदादा के ज़माने से लेकर आज तक हमारा क़ुसूर संजीदा रहा है। इसी वजह से हम बार बार परदेसी हुक्मरानों के क़ब्ज़े में आए हैं जिन्होंने हमें और हमारे बादशाहों और इमामों को क़त्ल किया, गिरिफ़्तार किया, लूट लिया और हमारी बेहुरमती की। बल्कि आज तक हमारी हालत यही रही है।
6लेकिन इस वक़्त रब हमारे ख़ुदा ने थोड़ी देर के लिए हम पर मेहरबानी की है। हमारी क़ौम के बचे-खुचे हिस्से को उसने रिहाई देकर अपने मुक़द्दस मक़ाम पर महफ़ूज़ रखा है। यों हमारे ख़ुदा ने हमारी आँखों में दुबारा चमक पैदा की और हमें कुछ सुकून मुहैया किया है, गो हम अब तक ग़ुलामी में हैं।
7बेशक हम ग़ुलाम हैं, तो भी अल्लाह ने हमें तर्क नहीं किया बल्कि फ़ारस के बादशाह को हम पर मेहरबानी करने की तहरीक दी है। उसने हमें अज़ सरे-नौ ज़िंदगी अता की है ताकि हम अपने ख़ुदा का घर दुबारा तामीर और उसके खंडरात बहाल कर सकें। अल्लाह ने हमें यहूदाह और यरूशलम में एक महफ़ूज़ चारदीवारी से घेर रखा है।
8लेकिन ऐ हमारे ख़ुदा, अब हम क्या कहें? अपनी इन हरकतों के बाद हम क्या जवाब दें? हमने तेरे उन अहकाम को नज़रंदाज़ किया है
9जो तूने अपने ख़ादिमों यानी नबियों की मारिफ़त दिए थे।
10लिहाज़ा अपनी बेटियों की उनके बेटों के साथ शादी मत करवाना, न अपने बेटों का उनकी बेटियों के साथ रिश्ता बाँधना। कुछ न करो जिससे उनकी सलामती और कामयाबी बढ़ती जाए। तब ही तुम ताक़तवर होकर मुल्क की अच्छी पैदावार खाओगे, और तुम्हारी औलाद हमेशा तक मुल्क की अच्छी चीज़ें विरासत में पाती रहेगी।’
11अब हम अपनी शरीर हरकतों और बड़े क़ुसूर की सज़ा भुगत रहे हैं, गो ऐ अल्लाह, तूने हमें इतनी सख़्त सज़ा नहीं दी जितनी हमें मिलनी चाहिए थी। तूने हमारा यह बचा-खुचा हिस्सा ज़िंदा छोड़ा है।
12तो क्या यह ठीक है कि हम तेरे अहकाम की ख़िलाफ़वरज़ी करके ऐसी क़ौमों से रिश्ता बाँधें जो इस क़िस्म की घिनौनी हरकतें करती हैं? हरगिज़ नहीं! क्या इसका यह नतीजा नहीं निकलेगा कि तेरा ग़ज़ब हम पर नाज़िल होकर सब कुछ तबाह कर देगा और यह बचा-खुचा हिस्सा भी ख़त्म हो जाएगा?
13ऐ रब इसराईल के ख़ुदा, तू ही आदिल है। आज हम बचे हुए हिस्से की हैसियत से तेरे हुज़ूर खड़े हैं। हम क़ुसूरवार हैं और तेरे सामने क़ायम नहीं रह सकते।”