1या रब्ब, नसल दर नसल, तू ही हमारी पनाहगाह रहा है।
2इससे पहले के पहाड़ पैदा हुए,
3तू इंसान को फिर ख़ाक में मिला देता है,
4क्यूँकि तेरी नज़र में हज़ार बरस ऐसे हैं,
5तू उनको जैसे सैलाब से बहा ले जाता है;
6वह सुबह को लहलहाती और बढ़ती है,
7क्यूँकि हम तेरे क़हर से फ़ना हो गए;
8तूने हमारी बदकिरदारी को अपने सामने रख्खा,
9क्यूँकि हमारे तमाम दिन तेरे क़हर में गुज़रे,
10हमारी उम्र की मी'आद सत्तर बरस है,
11तेरे क़हर की शिद्दत को कौन जानता है,
12हम को अपने दिन गिनना सिखा,
13ऐ ख़ुदावन्द, बाज़ आ! कब तक?
14सुबह को अपनी शफ़क़त से हम को आसूदा कर,
15जितने दिन तूने हम को दुख दिया,
16तेरा काम तेरे बन्दों पर,
17और रब्ब हमारे ख़ुदा का करम हम पर साया करे।