1ऐ लश्करों के ख़ुदावन्द! तेरे घर क्या ही दिलकश हैं!
2मेरी जान ख़ुदावन्द की बारगाहों की मुश्ताक़ है,
3ऐ लश्करों के ख़ुदावन्द! ऐ मेरे बादशाहऔर मेरे ख़ुदा!
4मुबारक हैं वह जो तेरे घर में रहते हैं,
5मुबारक है वह आदमी, जिसकी ताक़त तुझ से है,
6वह वादी — ए — बुका से गुज़र कर उसे चश्मों की जगह बना लेते हैं,
7वह ताक़त पर ताक़त पाते हैं;
8ऐ ख़ुदावन्द, लश्करों के ख़ुदा,
9ऐ ख़ुदा! ऐ हमारी सिपर! देख;
10क्यूँकि तेरी बारगाहों में एक दिन हज़ार से बेहतर है।
11क्यूँकि ख़ुदावन्द ख़ुदा, आफ़ताब और ढाल है;
12ऐ लश्करों के ख़ुदावन्द!