1ऐ ख़ुदा मुझ को बचा ले, क्यूँकि पानी मेरी जान तक आ पहुँचा है।
2मैं गहरी दलदल में धंसा जाता हूँ, जहाँ खड़ा नहीं रहा जाता;
3मैं चिल्लाते चिल्लाते थक गया, मेरा गला सूख गया;
4मुझ से बे वजह 'अदावत रखने वाले, मेरे सिर के बालों से ज़्यादा हैं;
5ऐ ख़ुदा, तू मेरी बेवक़ूफ़ी से वाक़िफ़ है,
6ऐ ख़ुदावन्द, लश्करों के ख़ुदा, तेरी उम्मीद रखने वाले मेरी वजह से शर्मिन्दा न हों,
7क्यूँकि तेरे नाम की ख़ातिर मैंने मलामत उठाई है,
8मैं अपने भाइयों के नज़दीक बेगाना बना हूँ,
9क्यूँकि तेरे घर की गै़रत मुझे खा गई,
10मेरे रोज़ा रखने से मेरी जान ने ज़ारी की,
11जब मैं ने टाट ओढ़ा,
12फाटक पर बैठने वालों में मेरा ही ज़िक्र रहता है,
13लेकिन ऐ ख़ुदावन्द, तेरी ख़ुशनूदी के वक़्त मेरी दुआ तुझ ही से है;
14मुझे दलदल में से निकाल ले और धसने न दे:मुझ से 'अदावत रखने वालों,
15मैं सैलाब में डूब न जाऊँ,
16ऐ ख़ुदावन्द, मुझे जवाब दे, क्यूँकि मेरी शफ़क़त ख़ूब है
17अपने बन्दे से रूपोशी न कर;
18मेरी जान के पास आकर उसे छुड़ा ले
19तू मेरी मलामत और शर्मिन्दगी और रुस्वाई से वाक़िफ़ है;
20मलामत ने मेरा दिल तोड़ दिया, मैं बहुत उदास हूँ
21उन्होंने मुझे खाने को इन्द्रायन भी दिया,
22उनका दस्तरख़्वान उनके लिए फंदा हो जाए।
23उनकी आँखें तारीक हो जाएँ, ताकि वह देख न सके,
24अपना ग़ज़ब उन पर उँडेल दे,
25उनका घर उजड़ जाए,
26क्यूँकि वह उसको जिसे तूने मारा है और जिनको तूने जख़्मी किया है,
27उनके गुनाह पर गुनाह बढ़ा;
28उनके नाम किताब — ए — हयात से मिटा
29लेकिन मैं तो ग़रीब और ग़मगीन हूँ।
30मैं हम्द गाकर ख़ुदा के नाम की ता'रीफ़ करूँगा,
31यह ख़ुदावन्द को बैल से ज़्यादा पसन्द होगा,
32हलीम इसे देख कर ख़ुश हुए हैं;
33क्यूँकि ख़ुदावन्द मोहताजों की सुनता है,
34आसमान और ज़मीन उसकी ता'रीफ़ करें,
35क्यूँकि ख़ुदा सिय्यून को बचाएगा,
36उसके बन्दों की नसल भी उसकी मालिक होगी,