1ऐ ज़बरदस्त, तू शरारत पर क्यूँ फ़ख़्र करता है?
2तेरी ज़बान महज़ शरारत ईजाद करती है;
3तू बदी को नेकी से ज़्यादा पसंद करता है,
4ऐ दग़ाबाज़ ज़बान!
5ख़ुदा भी तुझे हमेशा के लिए हलाक कर डालेगा;
6सादिक़ भी इस बात को देख कर डर जाएँगे,
7कि देखो, यह वही आदमी है जिसने ख़ुदा को अपनी पनाहगाह न बनाया,
8लेकिन मैं तो ख़ुदा के घर में जैतून के हरे दरख़्त की तरह हूँ।
9मैं हमेशा तेरी शुक्रगुज़ारी करता रहूँगा,