1वह बस्ती जो लोगों से भरी थी, कैसी ख़ाली पड़ी है!
2वह रात को ज़ार — ज़ार रोती है, उसके आँसू चेहरे पर बहते हैं;
3यहूदाह ज़ुल्म और सख़्त मेहनत की वजह से जिलावतन हुआ,
4सिय्यून के रास्ते मातम करते हैं,
5उसके मुख़ालिफ़ ग़ालिब आए और दुश्मन खु़शहाल हुए;
6सिय्यून की बेटियों की सब शान — ओ — शौकत जाती रही;
7येरूशलेम को अपने ग़म — ओ — मुसीबत के दिनों में,
8येरूशलेम सख़्त गुनाह करके नापाक हो गया;
9उसकी नापाकी उसके दामन में है,
10दुश्मन ने उसकी तमाम 'उम्दा चीज़ों पर हाथ बढ़ाया है;
11उसके सब रहने वाले कराहते और रोटी ढूंडते हैं,
12ऐ सब आने जाने वालों, क्या तुम्हारे नज़दीक ये कुछ नहीं?
13उसने 'आलम — ए — बाला से मेरी हड्डियों में आग भेजी,
14मेरी ख़ताओं का बोझ उसी के हाथ से बाँधा गया है;
15ख़ुदावन्द ने मेरे अन्दर ही मेरे बहादुरों को नाचीज़ ठहराया;
16इसीलिए मैं रोती हूँ, मेरी आँखें आँसू से भरी हैं,
17सिय्यून ने हाथ फैलाए; उसे तसल्ली देने वाला कोई नहीं;
18ख़ुदावन्द सच्चा है, क्यूँकि मैंने उसके हुक्म से नाफ़रमानी की है;
19मैंने अपने दोस्तों को पुकारा, उन्होंने मुझे धोका दिया;
20ऐ ख़ुदावन्द देख: मैं तबाह हाल हूँ, मेरे अन्दर पेच — ओ — ताब है;
21उन्होंने मेरी आहें सुनी हैं;
22उनकी तमाम शरारत तेरे सामने आयें;