1“क्या इंसान के लिए ज़मीन पर जंग — ओ — जदल नहीं?
2जैसे नौकर साये की बड़ी आरज़ू करता है,
3वैसे ही मैं बुतलान के महीनों का मालिक बनाया गया हूँ,
4जब मैं लेटता हूँ तो कहता हूँ,
5मेरा जिस्म कीड़ों और मिट्टी के ढेलों से ढका है।
6मेरे दिन जुलाहे की ढरकी से भी तेज़
7'आह, याद कर कि मेरी ज़िन्दगी हवा है,
8जो मुझे अब देखता है उसकी आँख मुझे फिर न देखेगी।
9जैसे बादल फटकर ग़ायब हो जाता है,
10वह अपने घर को फिर न लौटेगा, न उसकी जगह उसे फिर पहचानेगी।
11इसलिए मैं अपना मुँह बंद नहीं रख्खूँगा;
12क्या मैं समन्दर हूँ या मगरमच्छ',
13जब मैं कहता हूँ। मेरा बिस्तर मुझे आराम पहुँचाएगा,
14तो तू ख़्वाबों से मुझे डराता,
15यहाँ तक कि मेरी जान फाँसी,
16मुझे अपनी जान से नफ़रत है;
17इंसान की औकात ही क्या है जो तू उसे सरफ़राज़ करे,
18और हर सुबह उसकी ख़बर ले,
19तू कब तक अपनी निगाह मेरी तरफ़ से नहीं हटाएगा,
20ऐ बनी आदम के नाज़िर, अगर मैंने गुनाह किया है तो तेरा क्या बिगाड़ता हूँ?
21तू मेरा गुनाह क्यूँ नहीं मु'आफ़ करता,