1“मेरी रूह मेरी ज़िन्दगी से परेशान है;
2मैं ख़ुदा से कहूँगा, मुझे मुल्ज़िम न ठहरा;
3क्या तुझे अच्छा लगता है, कि अँधेर करे,
4क्या तेरी आँखें गोश्त की हैं?
5क्या तेरे दिन आदमी के दिन की तरह,
6कि तू मेरी बदकारी को पूछता,
7क्या तुझे मा'लूम है कि मैं शरीर नहीं हूँ,
8तेरे ही हाथों ने मुझे बनाया और सरासर जोड़ कर कामिल किया।
9याद कर कि तूने गुंधी हुई मिट्टी की तरह मुझे बनाया,
10क्या तूने मुझे दूध की तरह नहीं उंडेला,
11फिर तूने मुझ पर चमड़ा और गोश्त चढ़ाया,
12तूने मुझे जान बख़्शी और मुझ पर करम किया,
13तोभी तूने यह बातें तूने अपने दिल में छिपा रख्खी थीं।
14अगर मैं गुनाह करूँ, तो तू मुझ पर निगरान होगा;
15अगर मैं गुनाह करूँ तो मुझ पर अफ़सोस!
16और अगर सिर उठाऊँ, तो तू शेर की तरह मुझे शिकार करता है
17तू मेरे ख़िलाफ़ नए नए गवाह लाता है,
18इसलिए तूने मुझे रहम से निकाला ही क्यूँ?
19मैं ऐसा होता कि गोया मैं था ही नहीं मैं रहम ही से क़ब्र में पहुँचा दिया जाता।
20क्या मेरे दिन थोड़े से नहीं? बाज़ आ,
21इससे पहले कि मैं वहाँ जाऊँ,
22गहरी तारीकी की सर ज़मीन जो खु़द तारीकी ही है;