1हमारे प्रभु ने कैसे अपने कोप में
2प्रभु ने याकोब के समस्त आवासों को निगल लिया है
3उन्होंने उग्र क्रोध में इस्राएल के
4एक शत्रु के सदृश उन्होंने अपना धनुष खींचा;
5हमारे प्रभु ने एक शत्रु का स्वरूप धारण कर लिया है;
6अपनी कुटीर को उन्होंने ऐसे उजाड़ दिया है, मानो वह एक उद्यान कुटीर था;
7हमारे प्रभु को अब अपनी ही वेदी से घृणा हो गई है
8यह याहवेह का संकल्प था कि
9उसके प्रवेश द्वार भूमि में धंस गए;
10ज़ियोन की पुत्री के पूर्वज
11रोते-रोते मेरे नेत्र अपनी ज्योति खो चुके हैं,
12वे अपनी-अपनी माताओं के समक्ष रोकर कह रहे हैं,
13येरूशलेम की पुत्री,
14तुम्हारे भविष्यवक्ताओं ने तुम्हारे लिए व्यर्थ
15वे सब जो इस ओर से निकलते हैं
16तुम्हारे सभी शत्रु तुम्हारे लिए अपमानपूर्ण शब्दों का प्रयोग करते हुए;
17याहवेह ने अपने लक्ष्य की पूर्ति कर ही ली है;
18ज़ियोन की पुत्री की दीवार
19उठो, रात्रि में दोहाई दो,
20“याहवेह, ध्यान से देखकर विचार कीजिए:
21“सड़क की धूलि में
22“आपने तो मेरे आतंकों का आह्वान चारों ओर से इस ढंग से किया,