1परमेश्वर! आपने क्यों हमें सदा के लिए शोकित छोड़ दिया है?
2स्मरण कीजिए उन लोगों को, जिन्हें आपने मोल लिया था,
3इन चिरस्थाई विध्वंस अवशेषों के मध्य चलते फिरते रहिए,
4एक समय जहां आप हमसे भेंटकरते थे, वहां शत्रु के जयघोष के नारे गूंज रहे हैं;
5उनका व्यवहार वृक्षों और झाड़ियों पर
6उन्होंने कुल्हाड़ियों और हथौड़ों से
7उन्होंने आपके मंदिर को भस्म कर धूल में मिला दिया है;
8उन्होंने यह कहते हुए संकल्प किया, “इन्हें हम पूर्णतः कुचल देंगे!”
9अब कहीं भी आश्चर्य कार्य नहीं देखे जा रहे;
10परमेश्वर, शत्रु कब तक आपका उपहास करता रहेगा?
11आपने क्यों अपना हाथ रोके रखा है, आपका दायां हाथ?
12परमेश्वर, आप युग-युग से मेरे राजा रहे हैं;
13आप ही ने अपनी सामर्थ्य से समुद्र को दो भागों में विभक्त किया था;
14लिवयाथान74:14 बड़ा मगरमच्छ हो सकता है के सिर भी आपने ही कुचले थे,
15आपने ही झरने और धाराएं प्रवाहित की;
16दिन तो आपका है ही, साथ ही रात्रि भी आपकी ही है;
17पृथ्वी की समस्त सीमाएं आपके द्वारा निर्धारित की गई हैं;
18याहवेह, स्मरण कीजिए शत्रु ने कैसे आपका उपहास किया था,
19अपने कबूतरी का जीवन हिंसक पशुओं के हाथ में न छोड़िए;
20अपनी वाचा की लाज रख लीजिए,
21दमित प्रजा को लज्जित होकर लौटना न पड़े;
22परमेश्वर, उठ जाइए और अपने पक्ष की रक्षा कीजिए;
23अपने विरोधियों के आक्रोश की अनदेखी न कीजिए,