1“इसी समय पुकारकर देख. है कोई जो इसे सुनेगा?
2क्रोध ही मूर्ख व्यक्ति के विनाश का कारण हो जाता है,
3मैंने मूर्ख को जड़ पकडे देखा है,
4उसकी संतान सुरक्षित नहीं है, नगर चौक में वे कष्ट के लक्ष्य बने हुए हैं,
5उसकी कटी हुई उपज भूखे लोग खा जाते हैं,
6कष्ट का उत्पन्न धूल से नहीं होता
7जिस प्रकार चिंगारियां ऊपर दिशा में ही बढ़ती हैं
8“हां, मैं तो परमेश्वर की खोज करूंगा;
9वही विलक्षण एवं अगम्य कार्य करते हैं,
10वही पृथ्वी पर वृष्टि बरसाते
11तब वह विनम्रों को ऊंचे स्थान पर बैठाते हैं,
12वह चालाक के षड़्यंत्र को विफल कर देते हैं,
13वह बुद्धिमानों को उन्हीं की युक्ति में उलझा देते हैं
14दिन में ही वे अंधकार में जा पड़ते हैं
15किंतु प्रतिरक्षा के लिए परमेश्वर का वचन है उनके मुख की तलवार;
16तब निस्सहाय के लिए आशा है,
17“ध्यान दो, कैसा प्रसन्न है वह व्यक्ति जिसको परमेश्वर ताड़ना देते हैं;
18चोट पहुंचाना और मरहम पट्टी करना, दोनों ही उनके द्वारा होते हैं;
19वह छः कष्टों से तुम्हारा निकास करेंगे,
20अकाल की स्थिति में परमेश्वर तुम्हें मृत्यु से बचाएंगे,
21तुम चाबुक समान जीभ से सुरक्षित रहोगे,
22हिंसा तथा अकाल तुम्हारे लिए उपहास के विषय होंगे,
23तुम खेत के पत्थरों के साथ रहोगे
24तुम्हें यह तो मालूम हो जाएगा कि तुम्हारा डेरा सुरक्षित है;
25तुम्हें यह भी बोध हो जाएगा कि तुम्हारे वंशजों की संख्या बड़ी होगी,
26मृत्यु की बेला में भी तुम्हारे शौर्य का ह्रास न हुआ होगा,
27“इस पर ध्यान दो: हमने इसे परख लिया है यह ऐसा ही है.