1“सुनो, मेरे नेत्र यह सब देख चुके हैं, मेरे कानों ने,
2जो कुछ तुम्हें मालूम है, वह सब मुझे मालूम है;
3हां, मैं इसका उल्लेख सर्वशक्तिमान से अवश्य करूंगा,
4तुम तो झूठी बात का चित्रण कर रहे हो;
5उत्तम तो यह होता कि तुम चुप रहते!
6कृपा कर मेरे विवाद पर ध्यान दो;
7क्या तुम वह बात करोगे, जो परमेश्वर की दृष्टि में अन्यायपूर्ण है?
8क्या तुम परमेश्वर के लिए पक्षपात करोगे?
9क्या जब तुम्हारी परख की जाएगी, तो यह तुम्हारे हित में होगा?
10यदि तुम गुप्त में पक्षपात करोगे,
11क्या परमेश्वर का माहात्म्य तुम्हें भयभीत न कर देगा?
12तुम्हारी उक्तियां राख के नीतिवचन के समान हैं;
13“मेरे सामने चुप रहो, कि मैं अपने विचार प्रस्तुत कर सकूं;
14भला मैं स्वयं को जोखिम में क्यों डालूं
15चाहे परमेश्वर मेरा घात भी करें, फिर भी उनमें मेरी आशा बनी रहेगी;
16यही मेरी छुटकारे का कारण होगा,
17बड़ी सावधानीपूर्वक मेरा वक्तव्य सुन लो;
18अब सुन लो, प्रस्तुति के लिए मेरा पक्ष तैयार है,
19कौन करेगा मुझसे वाद-विवाद?
20“परमेश्वर, मेरी दो याचनाएं पूर्ण कर दीजिए,
21मुझ पर से अपना कठोर हाथ दूर कर लीजिए,
22तब मुझे बुला लीजिए कि मैं प्रश्नों के उत्तर दे सकूं,
23कितने हैं मेरे पाप एवं अपराध?
24आप मुझसे अपना मुख क्यों छिपा रहे हैं?
25क्या आप एक वायु प्रवाह में उड़ती हुई पत्ती को यातना देंगे?
26आपने मेरे विरुद्ध कड़वे आरोपों की सूची बनाई है
27आपने मेरे पांवों में बेड़ियां डाल दी है;
28“तब मनुष्य किसी सड़ी-गली वस्तु के समान नष्ट होता जाता है,