1इसके बाद नआमथवासी ज़ोफर ने कहना प्रारंभ किया:
2“क्या मेरे इतने सारे शब्दों का उत्तर नहीं मिलेगा?
3क्या तुम्हारी अहंकार की बातें लोगों को चुप कर पाएगी?
4क्योंकि तुमने तो कहा है, ‘मेरी शिक्षा निर्मल है
5किंतु यह संभव है कि परमेश्वर संवाद करने लगें
6वह तुम पर ज्ञान का रहस्य प्रगट कर दें,
7“क्या, परमेश्वर के रहस्य की गहराई को नापना तुम्हारे लिए संभव है?
8क्या करोगे तुम? वे तो आकाश-समान उन्नत हैं.
9इसका विस्तार पृथ्वी से भी लंबा है
10“यदि वह आएं तथा तुम्हें बंदी बना दें, तथा तुम्हारे लिए अदालत आयोजित कर दें,
11वह तो पाखंडी को पहचान लेते हैं, उन्हें तो यह भी आवश्यकता नहीं;
12जैसे जंगली गधे का बच्चा मनुष्य नहीं बन सकता,
13“यदि तुम अपने हृदय को शुद्ध दिशा की ओर बढ़ाओ,
14यदि तुम्हारे हाथ जिस पाप में फंसे है,
15तो तुम निःसंकोच अपना सिर ऊंचा कर सकोगे
16क्योंकि तुम्हें अपने कष्टों का स्मरण रहेगा,
17तब तुम्हारा जीवन दोपहर के सूरज से भी अधिक प्रकाशमान हो जाएगा,
18तब तुम विश्वास करोगे, क्योंकि तब तुम्हारे सामने होगी एक आशा;
19कोई भी तुम्हारी निद्रा में बाधा न डालेगा,
20किंतु दुर्वृत्तों की दृष्टि शून्य हो जाएगी,