1“येरूशलेम के मार्गों पर इधर-उधर ध्यान करो,
2यद्यपि वे अपनी शपथ में यह अवश्य कहते हैं, ‘जीवित याहवेह की शपथ,’
3याहवेह, क्या आपके नेत्र सत्य की अपेक्षा नहीं करते?
4तब मैंने विचार किया, “वे तो मात्र निर्धन हैं;
5मैं उनके अगुए से भेंट करूंगा;
6तब वन से एक सिंह आकर उनका वध करेगा,
7“मैं भला तुम्हें क्षमा क्यों करूं?
8वे उन घोड़ों के सदृश हैं, जो पुष्ट हैं तथा जिनमें काम-वासना समाई हुई है,
9क्या मैं ऐसे लोगों को दंड न दूं?”
10“जाओ इस देश की द्राक्षालता की पंक्तियों के मध्य जाकर उन्हें नष्ट कर दो,
11क्योंकि इस्राएल वंश तथा यहूदाह गोत्र ने
12उन्होंने याहवेह के विषय में झूठी अफवाएं प्रसारित की हैं;
13उनके भविष्यद्वक्ता मात्र वायु हैं
14तब याहवेह सेनाओं के परमेश्वर की बात यह है:
15इस्राएल वंश यह देखना,” यह याहवेह की वाणी है,
16उनका तरकश रिक्त कब्र सदृश है;
17वे तुम्हारी उपज तथा तुम्हारा भोजन निगल जाएंगे,
18“फिर भी उन दिनों में,” यह याहवेह की वाणी है, “मैं तुम्हें पूर्णतः नष्ट नहीं करूंगा.
19यह उस समय होगा जब वे यह कह रहे होंगे, ‘याहवेह हमारे परमेश्वर ने हमारे साथ यह सब क्यों किया है?’ तब तुम्हें उनसे यह कहना होगा, ‘इसलिये कि तुमने मुझे भूलना पसंद कर दिया है तथा अपने देश में तुमने परकीय देवताओं की उपासना की है, तब तुम ऐसे देश में अपरिचितों की सेवा करोगे जो देश तुम्हारा नहीं है.’
20“याकोब वंशजों में यह प्रचार करो
21मूर्ख और अज्ञानी लोगों, यह सुन लो,
22क्या तुम्हें मेरा कोई भय नहीं?” यह याहवेह की वाणी है.
23किंतु इन लोगों का हृदय हठी एवं विद्रोही है;
24यह विचार उनके हृदय में आता ही नहीं,
25तुम्हारे अधर्म ने इन्हें दूर कर दिया है;
26“मेरी प्रजा में दुष्ट व्यक्ति भी बसे हुए हैं
27जैसे पक्षी से पिंजरा भर जाता है,
28और वे मोटे हैं और वे चिकने हैं.
29क्या मैं ऐसे व्यक्तियों को दंड न दूं?”
30“देश में भयावह
31भविष्यद्वक्ता झूठी भविष्यवाणी करते हैं,