1“उठो, प्रकाशमान हो, क्योंकि तुम्हारा प्रकाश आया है,
2देख, पृथ्वी पर तो अंधकार
3अन्य जातियां तुम्हारे पास प्रकाश के लिये,
4“अपने आस-पास दृष्टि उठाकर देख:
5तब तुम देखोगे तथा आनंदित होओगे,
6तुम्हारे देश असंख्य ऊंटों से भर जाएंगे,
7केदार की सब भेड़-बकरियां तुम्हारी हो जायेंगी,
8“कौन हैं ये जो बादल समान उड़ते हैं,
9निश्चय द्वीप मेरी प्रतीक्षा करेंगे;
10“परदेशी लोग तेरी शहरपनाह को उठाएंगे,
11तुम्हारे फाटक निरंतर खुले रहेंगे,
12वे लोग तथा वे राज्य जो तुम्हारी सेवा करना अस्वीकार करेंगे, नष्ट हो जाएंगे;
13“लबानोन का वैभव तुम्हारा हो जाएगा,
14जिन्होंने तुम पर अत्याचार किया है, उनके पुत्र तुम्हारे सामने झुक जाएंगे;
15“जब तुम त्यागी हुई घृणा के नगर थे,
16तू अन्य जनताओं का दूध पी लेगी
17कांस्य के स्थान पर मैं सोना,
18अब तुम्हारे देश में फिर हिंसा न होगी,
19तब दिन के समय तुम्हें प्रकाश के लिए,
20तुम्हारा सूर्य कभी अस्त न होगा,
21तब तुम्हारे लोग धर्मी हो जाएंगे
22सबसे छोटा एक हजार हो जायेगा,