1पृथ्वी और जो कुछ उसमें है यहोवा ही का है;
2क्योंकि उसी ने उसकी नींव समुद्रों के ऊपर दृढ़ करके रखी24:2 उसी ने उसकी नींव समुद्रों के ऊपर दृढ़ करके रखी: जैसे पृथ्वी जल से घिरी प्रतीत होती है तो उसे जल पर नींव डालकर दृढ़ रखने की अभिव्यक्ति स्वाभाविक है।,
3यहोवा के पर्वत पर कौन चढ़ सकता है?
4जिसके काम निर्दोष24:4 जिसके काम निर्दोष: अर्थात् जो खरा है। हृदय शुद्ध है अर्थात् बाहरी आचरण ही खरा न हो उसका मन भी शुद्ध हो। और हृदय शुद्ध है,
5वह यहोवा की ओर से आशीष पाएगा,
6ऐसे ही लोग उसके खोजी है,
7हे फाटकों, अपने सिर ऊँचे करो!
8वह प्रतापी राजा कौन है?
9हे फाटकों, अपने सिर ऊँचे करो
10वह प्रतापी राजा कौन है?