1धन्य है यहोवा, जो मेरी चट्टान है,
2वह मेरे लिये करुणानिधान और गढ़,
3हे यहोवा, मनुष्य क्या है कि तू उसकी सुधि लेता है,
4मनुष्य तो साँस के समान है;
5हे यहोवा, अपने स्वर्ग को नीचा करके उतर आ!
6बिजली कड़काकर उनको तितर-बितर कर दे,
7अपना हाथ ऊपर से बढ़ाकर मुझे महासागर से उबार,
8उनके मुँह से तो झूठी बातें निकलती हैं,
9हे परमेश्वर, मैं तेरी स्तुति का नया गीत गाऊँगा;
10तू राजाओं का उद्धार करता है,
11मुझ को उबार और परदेशियों के वश से छुड़ा ले,
12हमारे बेटे जवानी के समय पौधों के समान बढ़े हुए हों144:12 हमारे बेटे जवानी के समय पौधों के समान बढ़े हुए हों: अर्थात् आरम्भिक जीवन ही में वे स्वस्थ, बलवन्त, जीवन्त, गठे हुए रहे हों।,
13हमारे खत्ते भरे रहें, और उनमें भाँति-भाँति का अन्न रखा जाए,
14तब हमारे बैल खूब लदे हुए हों;
15तो इस दशा में जो राज्य हो वह क्या ही धन्य होगा!