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नीतिवचन 26

इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) हिंदी - 2019 · hindi

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1जैसा धूपकाल में हिम का, या कटनी के समय वर्षा होना,

2जैसे गौरैया घूमते-घूमते और शूपाबेनी उड़ते-उड़ते नहीं बैठती,

3घोड़े के लिये कोड़ा, गदहे के लिये लगाम,

4मूर्ख को उसकी मूर्खता के अनुसार उत्तर न देना ऐसा न हो कि तू भी उसके तुल्य ठहरे।

5मूर्ख को उसकी मूर्खता के अनुसार उत्तर देना,

6जो मूर्ख के हाथ से सन्देशा भेजता है,

7जैसे लँगड़े के पाँव लड़खड़ाते हैं,

8जैसे पत्थरों के ढेर में मणियों की थैली,

9जैसे मतवाले के हाथ में काँटा गड़ता है,

10जैसा कोई तीरन्दाज जो अकारण सब को मारता हो,

11जैसे कुत्ता अपनी छाँट को चाटता है,

12यदि तू ऐसा मनुष्य देखे जो अपनी दृष्टि में बुद्धिमान बनता हो,

13आलसी कहता है, “मार्ग में सिंह है,

14जैसे किवाड़ अपनी चूल पर घूमता है,

15आलसी अपना हाथ थाली में तो डालता है,

16आलसी अपने को ठीक उत्तर देनेवाले

17जो मार्ग पर चलते हुए पराए झगड़े में विघ्न डालता है,

18जैसा एक पागल जो जहरीले तीर मारता है,

19वैसा ही वह भी होता है जो अपने पड़ोसी को धोखा देकर कहता है,

20जैसे लकड़ी न होने से आग बुझती है,

21जैसा अंगारों में कोयला और आग में लकड़ी होती है,

22कानाफूसी करनेवाले के वचन,

23जैसा कोई चाँदी का पानी चढ़ाया हुआ मिट्टी का बर्तन हो,

24जो बैरी बात से तो अपने को भोला बनाता है,

25उसकी मीठी-मीठी बात पर विश्वास न करना,

26चाहे उसका बैर छल के कारण छिप भी जाए,

27जो गड्ढा खोदे, वही उसी में गिरेगा, और जो पत्थर लुढ़काए,

28जिसने किसी को झूठी बातों से घायल किया हो वह उससे बैर रखता है,

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नीतिवचन 26 — hindi:

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