1“मेरा प्राण निकलने पर है, मेरे दिन पूरे हो चुके हैं;
2निश्चय जो मेरे संग हैं वह ठट्ठा करनेवाले हैं,
3“जमानत दे, अपने और मेरे बीच में तू ही जामिन हो;
4तूने उनका मन समझने से रोका है17:4 तूने उनका मन समझने से रोका है: उसके तथाकथित मित्रों के मन को। अय्यूब कहता है कि वे अंधे और विकृत मानसिकता के हैं और उसका न्याय करने में अक्षम हैं। अत: वह याचना करता है कि वह अपना मुकद्दमा परमेश्वर के समक्ष रखेगा। ,
5जो अपने मित्रों को चुगली खाकर लूटा देता,
6“उसने ऐसा किया कि सब लोग मेरी उपमा देते हैं;
7खेद के मारे मेरी आँखों में धुंधलापन छा गया है,
8इसे देखकर सीधे लोग चकित होते हैं,
9तो भी धर्मी लोग अपना मार्ग पकड़े रहेंगे,
10तुम सब के सब मेरे पास आओ तो आओ,
11मेरे दिन तो बीत चुके, और मेरी मनसाएँ मिट गई,
12वे रात को दिन ठहराते;
13यदि मेरी आशा यह हो कि अधोलोक मेरा धाम होगा,
14यदि मैंने सड़ाहट से कहा, ‘तू मेरा पिता है,’
15तो मेरी आशा कहाँ रही?
16वह तो अधोलोक में उतर जाएगी17:16 वह तो अधोलोक में उतर जाएगी: अर्थात् मेरी आशा अधोलोक में चली जाएगी। जीवन और आनन्द की सब आशाएँ जिनको मैंने संजोया है, मेरे साथ ही वहाँ चली जाएगी।,