1“हे आकाश कान लगा, कि मैं बोलूँ;
2मेरा उपदेश मेंह के समान बरसेगा
3मैं तो यहोवा के नाम का प्रचार करूँगा।
4“वह चट्टान है, उसका काम खरा है32:4 वह चट्टान है, उसका काम खरा है: परमेश्वर के वे गुण जिन्हें लागू करने का प्रयास मूसा कर रहा था अपरिवर्तनीयता एवं अभेद्यता।;
5परन्तु इसी जाति के लोग टेढ़े और तिरछे हैं;
6हे मूर्ख और निर्बुद्धि लोगों,
7प्राचीनकाल के दिनों को स्मरण करो,
8जब परमप्रधान ने एक-एक जाति को निज-निज भाग बाँट दिया,
9क्योंकि यहोवा का अंश उसकी प्रजा है;
10“उसने उसको जंगल में,
11जैसे उकाब अपने घोंसले को हिला-हिलाकर
12यहोवा अकेला ही उसकी अगुआई करता रहा,
13उसने उसको पृथ्वी के ऊँचे-ऊँचे स्थानों पर सवार कराया,
14गायों का दही, और भेड़-बकरियों का दूध, मेम्नों की चर्बी,
15“परन्तु यशूरून मोटा होकर लात मारने लगा;
16उन्होंने पराए देवताओं को मानकर उसमें जलन उपजाई32:16 उसमें जलन उपजाई: यह भाषा विवाहित सम्बंध से ली गई है।;
17उन्होंने पिशाचों के लिये जो परमेश्वर न थे बलि चढ़ाए,
18जिस चट्टान से तू उत्पन्न हुआ उसको तू भूल गया,
19“इन बातों को देखकर यहोवा ने उन्हें तुच्छ जाना,
20तब उसने कहा, ‘मैं उनसे अपना मुख छिपा लूँगा,
21उन्होंने ऐसी वस्तु को जो परमेश्वर नहीं है मानकर,
22क्योंकि मेरे कोप की आग भड़क उठी है,
23“मैं उन पर विपत्ति पर विपत्ति भेजूँगा;
24वे भूख से दुबले हो जाएँगे, और अंगारों से
25बाहर वे तलवार से मरेंगे,
26मैंने कहा था, कि मैं उनको दूर-दूर तक तितर-बितर करूँगा,
27परन्तु मुझे शत्रुओं की छेड़-छाड़ का डर था,
28“क्योंकि इस्राएल जाति युक्तिहीन है,
29भला होता कि ये बुद्धिमान होते, कि इसको समझ लेते,
30यदि उनकी चट्टान ही उनको न बेच देती,
31क्योंकि जैसी हमारी चट्टान है वैसी उनकी चट्टान नहीं है,
32क्योंकि उनकी दाखलता सदोम की दाखलता से निकली,
33उनका दाखमधु साँपों का सा विष
34“क्या यह बात मेरे मन में संचित,
35पलटा लेना और बदला देना मेरा ही काम है,
36क्योंकि जब यहोवा देखेगा कि मेरी प्रजा की शक्ति जाती रही,
37तब वह कहेगा, उनके देवता कहाँ हैं,
38जो उनके बलिदानों की चर्बी खाते,
39“इसलिए अब तुम देख लो कि मैं ही वह हूँ,
40क्योंकि मैं अपना हाथ स्वर्ग की ओर उठाकर32:40 मैं अपना हाथ स्वर्ग की ओर उठाकर: हाथ उठाना शपथ खाने का संकेत है। कहता हूँ,
41इसलिए यदि मैं बिजली की तलवार पर सान धरकर झलकाऊँ,
42मैं अपने तीरों को लहू से मतवाला करूँगा,
43“हे अन्यजातियों, उसकी प्रजा के साथ आनन्द मनाओ;
44इस गीत के सब वचन मूसा ने नून के पुत्र यहोशू समेत आकर लोगों को सुनाए।
45जब मूसा ये सब वचन सब इस्राएलियों से कह चुका,
46तब उसने उनसे कहा, “जितनी बातें मैं आज तुम से चिताकर कहता हूँ उन सब पर अपना-अपना मन लगाओ, और उनके अर्थात् इस व्यवस्था की सारी बातों के मानने में चौकसी करने की आज्ञा अपने बच्चों को दो।
47क्योंकि यह तुम्हारे लिये व्यर्थ काम नहीं, परन्तु तुम्हारा जीवन ही है, और ऐसा करने से उस देश में तुम्हारी आयु के दिन बहुत होंगे, जिसके अधिकारी होने को तुम यरदन पार जा रहे हो।”
48फिर उसी दिन यहोवा ने मूसा से कहा,
49“उस अबारीम पहाड़ की नबो नामक चोटी पर, जो मोआब देश में यरीहो के सामने है, चढ़कर कनान देश, जिसे मैं इस्राएलियों की निज भूमि कर देता हूँ, उसको देख ले।
50तब जैसा तेरा भाई हारून होर पहाड़ पर मरकर अपने लोगों में मिल गया, वैसा ही तू इस पहाड़ पर चढ़कर मर जाएगा, और अपने लोगों में मिल जाएगा।
51इसका कारण यह है, कि सीन जंगल में, कादेश के मरीबा नाम सोते पर, तुम दोनों ने मेरा अपराध किया, क्योंकि तुम ने इस्राएलियों के मध्य में मुझे पवित्र न ठहराया।
52इसलिए वह देश जो मैं इस्राएलियों को देता हूँ, तू अपने सामने देख लेगा, परन्तु वहाँ जाने न पाएगा।”